Thursday, November 25, 2010

आज जवाबों की गुज़ारिश है तुझसे मौला
मेरी दुनिया मुझसे ही बांटकर तुझे क्या है मिला !!

क्या प्यार की बौछार नहीं थी दोनों तरफ
फिर उम्रदराज़ दरार डालकर तुझे क्या है मिला !!

इश्क़ करना जैसे तेरी इबादत था मेरे लिए
खुद से इस तरह हारकर तुझे क्या है मिला !!

बुन रहा था खुशियों से अपना अधूरा जहां
मुफ्त के ये ग़म सजाकर तुझे क्या है मिला !!

किसी ग़ैर को दोष देना , है मेरा ईमान नहीं
मेरे पीर , यह साज़िश रचाकर तुझे क्या है मिला !!

हर वक़्त हाज़िर था तेरी महफ़िल को सजाने
उस नादान को अपना साज़ बनाकर तुझे क्या है मिला !!

हँसते हँसते अलविदा कर गयी वो मुझे
मेरी रूह को बेवजह रुलाकर तुझे क्या है मिला !!

सामना है अब तो जैसे जहन्नुम के अँगारों से
जन्नत की बहारों से बेवक़्त निकालकर तुझे क्या है मिला !!

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