Tuesday, February 15, 2011


न जाने कितनी देर और नींदें इन आँखों से जुदा रहेंगी
हर बीतता पल अब गुनगुनाता शायद रात अभी बाकी है !

कभी भूला हुआ सा ग़म तो कभी नई उम्मीदों की चाह
और हर उलझा सवाल खुद से कहता शायद रात अभी बाकी है !

अक्सर बीते दिन के मेलों में खुशियों से भरे झूले याद आना
और चंद धुंधले पलों का समझाना शायद रात अभी बाकी है !

ज़िन्दगी की भीड़ से जुदा सपनों में खोने की हसरतें हैं
पर अनचाहे ख्यालों का याद दिलाना शायद रात अभी बाकी है !

कभी किसी मुरझाए से दिल को जीतने की कोशिश भर करना
फिर इन कोशिशों की ख्वाहिश में शायद रात अभी बाकी है !

कभी दिल के कड़े इम्तिहानों में खुद को बार बार आज़माना
और किसी भी तरह जीतने की साज़िश में शायद रात अभी बाकी है !

काश ज़िन्दगी की किसी नई करवट में नींदें आँखों से खफा न रहे
और करवटें बदलते हुए फिर न कहना पड़े शायद रात अभी बाकी है !