Saturday, December 14, 2013

तुम थे अभी
या फिर कोई ख़्वाब गुज़र गया
कहते हैं लोग
कहीं डूबे रहते हैं हम आजकल !

खफ़ा हैं सब
जो तुमसे कभी छीन पाए
कैसे समझाए उन्हें
वक़्त--हक़ अब भी तुम्हारा है !

रहने दो मायूस
फ़िक्र उनकी तब भी किसे थी
इबादत तेरी ख़ुशी
तुझे नाराज़ कभी देख पाऊंगा !

तू भी बेखबर
खुद से अनजान है अब तक
आईने में कहीं
तेरा शक़ बेपर्दा हो रहा है !

महंगे थे अफ़साने
खरीदते-खरीदते हम ही बिक गए
मुफ़्त मिली तन्हाई
बाकी ज़िन्दगी उसी में गुज़ार ली !

 वजह जो रही
मिली सज़ा दुश्मनों से भी बढ़कर
किससे करता दुआ
रहमत--खुदा भी अब नाराज़ है मुझसे !

दिन की भीड़
मसरूफ़ रहते दुनिया के किस्सों में
शाम की तन्हाई
अक्सर माहौल शायराना बना देती है !

कभी आना शाम
गुफ़्त-गू करें हम बीते कल की
कई हक़ मेरे
आज भी झगड़ते रहते हैं मुझसे !

कलम की स्याही
दस्तखत में तो पहचान बता जाती
गज़लों में कहीं
अब भी गुमनाम रहता हूँ मैं