दुनिया की मुतास्सिब* नज़रों से संभल ज़िन्दगी आगे बढ़ा करती है
मेरी कहानी, मेरी हसरतें इस जहां में अक्सर अधूरी रहा करती है
मां पत्नी बेटी तो कभी बहन बनकर परवाह करती आई हूँ मैं,
ढूँढो तो हर रिश्ते के वजूद में मेरी ही परछाई दिखा करती है !
इक मां बनकर फ़िक्र के आंचल में सबको छिपा लेती हूँ मैं
कभी पत्नी बनकर अनजान रिश्तों को भी निभा लेती हूँ मैं,
कभी बेटी कभी बहन बन नादां ज़िदें भी पूरी की है मैंने
इक छोटे से घर में ही अपना पूरा आशियाना सजा लेती हूँ मैं !
मैं आँसूं छिपा हर बात को ही सहन कर जाती हूँ
निभा लूँ जो हर रिश्ता तो खुद में ही निखर जाती हूँ,
जल उठे परिंदे जो खुले आसमां में उड़ान देखले मेरी
पर बंदिशों को देख अक्सर मैं बिखर-बिखर जाती हूँ !
हर बार मेरी हस्ती को इतना लाचार सबने बना दिया
हालातों के आगे मुझे ही समझौते करना भी सिखा दिया,
चंद सपने भी सजाया करती मैं तो ज़माने की कुछ रीतों पर
अपनी ख्वाहिशों को तो मैंने जैसे औरों के लिए ही भुला दिया !
क्यूं मेरी ही ज़िन्दगी दो रंगों से मिलकर है बनाई जाती
हर बार हदें-सरहदें मेरे ही अरमानों को क्यूं है दिखाई जाती,
चाहे दौलत हो या प्यार, समझौते ही देखे हैं मैंने किस्मत में
इक लड़की हूँ मैं, क्यूं हर बार ये बात मुझे है सिखाई जाती !
जानती हूँ इक रोज़ मेरी दुनिया ही मुझे बैगाना कर देती हैं
जिन चीज़ों को अपना समझती हूँ वो भी मुझे अनजाना कर देती हैं,
इस दुनिया को समझना चाहती हूँ मैं जिन नज़रों के साये में रहकर
वो मजबूर नज़रें ही मुझे इक दिन परायों को नज़राना* कर देती हैं !
वो बचपन, मेरा आंगन, हर ओर ही गूंजा करती मेरी आवाज़ है
पापा की थकी बाहों में लगता कुछ तो अलग इस रिश्ते का अंदाज़ है,
मां का वो प्यार से रूठना पर हरदम कुछ सिखाना ही मुझे
बेटी होकर भी मुझ पे इक बेटे से बढ़कर उन्हें नाज़ है ! मुतास्सिब : partial
नज़राना :Gift
Idea courtesy : Aditya Pagare