चारों ओर जगमगाहट है , रोशनी भी है सब ओर फैली
फिर किस किरण का इंतज़ार करती मेरे दिल की सूनी दिवाली
कहीं जश्न है ज़ोरों पर कहीं महफ़िलें भी हैं सजी
इन खुशियों की कोई वजह ढूँढती मेरे दिल की सूनी दिवाली
यहाँ मेरे चारों ओर उजालें हैं चमके , रंगोलियाँ हैं बिखरी
इन वादियों से रंग उधार माँगती मेरे दिल की सूनी दिवाली
दो पल का वक़्त नहीं यहाँ लोग इस क़दर मसरूफ* हैं
वहाँ आराम के बीच कुछ काम ढूँढती मेरे दिल की सूनी दिवाली
जहाँ कई बैगानों की मुबारक फ़ीकी सी लगने लगती है
वहाँ चंद अपनों को याद करती मेरे दिल की सूनी दिवाली
किसी अपने ने जब गुज़ारिश की इस जश्न में डूब जाने की
इक दिया भर जलाने निकल पड़ी मेरे दिल की सूनी दिवाली
अपनों से जब बिछड़ जाऊंगा कुछ अरमानों को पाने
तब शायद इक हौसला सा दे जाए मेरे दिल की सूनी दिवाली
1. मसरूफ : Busy In
are seasonal...bohat achi hai..:)
ReplyDeletetere dil ki sooni diwali bhi kaam dhoondti hai city ke robot...thoda kam kaam kar.Waise poem to nice hai :)
ReplyDeletefirst line to ek dum mast hai... Shaandaar yaar...
ReplyDelete... sundar gajal ... badhaai !!!
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