Tuesday, May 17, 2011


कहाँ गयी वो बेपरवाह रातें और वो खिलखिलाता सवेरा
सब  खो  ही  गया जैसे  जो  प्यारा सा बचपन था मेरा !

दिन की कड़ी धूप में भी सब सुनहरा सा लगने लगता था
और शाम की ठंडी छांव में सब पिघलने सा लगता था  ,
अब वक़्त की मसरूफ घड़ियों में हर पहर उलझा हुआ है
जैसे धुंधला ही गया जो नील सा उजला गगन था मेरा !!

भूल गया उन गलियों को जिनमें मैं बेख़ौफ़ दौड़ा करता था
उन यारों से खेल-खेल में नए रिश्तों को जोड़ा करता था ,
होश भी न रहा कब ज़माने ने समझदारी से जीना सिखा दिया
और बिन बताये छीन लिया किसी ने जो महका सा आँगन था मेरा !!

वो भोला बचपन जब अरमानों में ऊँचाइयाँ  न हुआ करती थी
चांद अपना मामा और तितलियाँ अपने लिए परी हुआ करती थी ,
अपने सपनो के हवाई जहाज़ में जैसे पूरी दुनिया घूम चुके थे हम
निकल चला वक़्त रफ़्तार से और रह गया पीछे जो कारवां था मेरा !!

हर रोज़ दादी की नयी-नयी कहानियों में खुद को ढूंढा करता था
पापा को 'डा' और मम्मा को 'मा' बुलाकर पुकारा करता था ,
भले छोटी सही पर लोरियों में कहीं नींद छिपी थी मेरी
टूट चूका शायद हसीन लम्हों से जड़ा जो छोटा सा पलंग था मेरा !!

हर मौसम के आने-जाने का दिल खोलकर इंतज़ार हम करते थे
स्कूल न जाने की फ़िराक में खुद को रोज़-रोज़ बीमार भी करते थे ,
फिर यारों के साथ मिलकर बारिश में भीगना भी होता था हमें
जाने क्यूँ छोड़ गया कश्तियों को तन्हा जो भीगा सा सावन था मेरा !!

टूटे - फूटे चन्द खिलौनों  से मैं अपना संसार बनाया करता था
उनकी अधूरी-बिखरी कहानी अपनी माँ को भी सुनाया करता था ,
अब भी याद है वो पहली बार साइकिल चला पाने की खुशी मुझे
जाने कैसे बिखर गया मिट्टी से बना इक अपना जहां था मेरा !!

न लौटेगा वो वक़्त जब अपनी हस्ती थोड़ी मासूम थोड़ी शैतान सी थी
ज़िन्दगी के उसी दौर में ज़िन्दगी जीना  ज़रा आसान भी थी ,
अब तो ढूँढना ही पड़ती है  वो बेपरवाह रातें और वो खिलखिलाता सवेरा
सब  खो  ही  गया जैसे  जो  प्यारा सा बचपन था मेरा !!

THANX to ANUBHA MANDHANYA for the Idea/Theme...:)