Friday, December 16, 2011


ज़ख्म भी मिले प्यार भरे रिश्तों से अक्सर 
पर ऐसा नही कि उन्हें निभाना ही छोड़ दिया

जहाँ भी गया ठोकरें ही पायी है नसीब में
पर ऐसा नही कि लोगों से याराना ही छोड़ दिया

पंख लगे अरमानों पर तो परिंदों संग उड़ चला
पर ऐसा नही कि मैंने अपना ठिकाना ही छोड़ दिया

वक़्त के चलते जुड़े सपने भी टूट कर बिखर गए
पर ऐसा नही कि मैंने नींदें सजाना ही छोड़ दिया

जानता हूँ सूनी ज़िन्दगी में सिर्फ तन्हाई है लिखी
पर ऐसा नही कि मैंने प्यार जताना ही छोड़ दिया

ग़मों ने इस रूह को बड़ी गहराइयों तक है छुआ
पर ऐसा नही कि इस दिल ने मुस्कुराना ही छोड़ दिया

जा रहा है कोई हमेशा के लिए मेरा जहां छोड़ कर
पर ऐसा नही कि आईना देख अब इतराना ही छोड़ दिया  

Tuesday, May 17, 2011


कहाँ गयी वो बेपरवाह रातें और वो खिलखिलाता सवेरा
सब  खो  ही  गया जैसे  जो  प्यारा सा बचपन था मेरा !

दिन की कड़ी धूप में भी सब सुनहरा सा लगने लगता था
और शाम की ठंडी छांव में सब पिघलने सा लगता था  ,
अब वक़्त की मसरूफ घड़ियों में हर पहर उलझा हुआ है
जैसे धुंधला ही गया जो नील सा उजला गगन था मेरा !!

भूल गया उन गलियों को जिनमें मैं बेख़ौफ़ दौड़ा करता था
उन यारों से खेल-खेल में नए रिश्तों को जोड़ा करता था ,
होश भी न रहा कब ज़माने ने समझदारी से जीना सिखा दिया
और बिन बताये छीन लिया किसी ने जो महका सा आँगन था मेरा !!

वो भोला बचपन जब अरमानों में ऊँचाइयाँ  न हुआ करती थी
चांद अपना मामा और तितलियाँ अपने लिए परी हुआ करती थी ,
अपने सपनो के हवाई जहाज़ में जैसे पूरी दुनिया घूम चुके थे हम
निकल चला वक़्त रफ़्तार से और रह गया पीछे जो कारवां था मेरा !!

हर रोज़ दादी की नयी-नयी कहानियों में खुद को ढूंढा करता था
पापा को 'डा' और मम्मा को 'मा' बुलाकर पुकारा करता था ,
भले छोटी सही पर लोरियों में कहीं नींद छिपी थी मेरी
टूट चूका शायद हसीन लम्हों से जड़ा जो छोटा सा पलंग था मेरा !!

हर मौसम के आने-जाने का दिल खोलकर इंतज़ार हम करते थे
स्कूल न जाने की फ़िराक में खुद को रोज़-रोज़ बीमार भी करते थे ,
फिर यारों के साथ मिलकर बारिश में भीगना भी होता था हमें
जाने क्यूँ छोड़ गया कश्तियों को तन्हा जो भीगा सा सावन था मेरा !!

टूटे - फूटे चन्द खिलौनों  से मैं अपना संसार बनाया करता था
उनकी अधूरी-बिखरी कहानी अपनी माँ को भी सुनाया करता था ,
अब भी याद है वो पहली बार साइकिल चला पाने की खुशी मुझे
जाने कैसे बिखर गया मिट्टी से बना इक अपना जहां था मेरा !!

न लौटेगा वो वक़्त जब अपनी हस्ती थोड़ी मासूम थोड़ी शैतान सी थी
ज़िन्दगी के उसी दौर में ज़िन्दगी जीना  ज़रा आसान भी थी ,
अब तो ढूँढना ही पड़ती है  वो बेपरवाह रातें और वो खिलखिलाता सवेरा
सब  खो  ही  गया जैसे  जो  प्यारा सा बचपन था मेरा !!

THANX to ANUBHA MANDHANYA for the Idea/Theme...:) 

Tuesday, March 15, 2011


न हमसफ़र की कोई खबर न इस सफर का अंजाम पता
फिर भी तन्हा राहों में मैं क्यूँ कर रहा किसी का इंतज़ार !

कहने को चार अल्फ़ाज़ों से बना सस्ता सा मेल है यह
पर ज़िन्दगी के हर मेले में बिकता इक महंगा सा इंतज़ार !

कहीं न कहीं लफ़्ज़ों के नापतोल में कुछ कमी रही होगी
जो अपने हिस्से में फिर पाया कुछ पल का इंतज़ार !

मेरे सपनों के आँगन में कभी-कभी धीमी आहट सी तो हुई
मगर दस्तक देता हुआ फिर मिला कुछ देर का इंतज़ार !

यूं तो तकदीर के हर इम्तिहान में अव्वल हैं रहे
पर हर बार हमें मात देता रहा इम्तिहान-ए-इंतज़ार !

सोचा भूल जाऊं सब और दूं उसे फिर अजनबी का नाम
मगर कैसे ठुकरा दूँ इक तीखे तोहफे जैसा यह इंतज़ार !

फिर जानबूझ कर बातों-बातों में खुद से करार कर लिया
वो क्या समझे बेकरारी जिस अनजानी ने दिया यह "इंतज़ार" !!


Tuesday, February 15, 2011


न जाने कितनी देर और नींदें इन आँखों से जुदा रहेंगी
हर बीतता पल अब गुनगुनाता शायद रात अभी बाकी है !

कभी भूला हुआ सा ग़म तो कभी नई उम्मीदों की चाह
और हर उलझा सवाल खुद से कहता शायद रात अभी बाकी है !

अक्सर बीते दिन के मेलों में खुशियों से भरे झूले याद आना
और चंद धुंधले पलों का समझाना शायद रात अभी बाकी है !

ज़िन्दगी की भीड़ से जुदा सपनों में खोने की हसरतें हैं
पर अनचाहे ख्यालों का याद दिलाना शायद रात अभी बाकी है !

कभी किसी मुरझाए से दिल को जीतने की कोशिश भर करना
फिर इन कोशिशों की ख्वाहिश में शायद रात अभी बाकी है !

कभी दिल के कड़े इम्तिहानों में खुद को बार बार आज़माना
और किसी भी तरह जीतने की साज़िश में शायद रात अभी बाकी है !

काश ज़िन्दगी की किसी नई करवट में नींदें आँखों से खफा न रहे
और करवटें बदलते हुए फिर न कहना पड़े शायद रात अभी बाकी है !