क्यूँ किसी की याद रूह को बार-बार छू जाती है
बादलों को शायद बरसने का कोई बहाना चाहिए
बे-बुनियाद उम्मीदों में सिर्फ नींदे उधार चढ़ती है
ऐ बेवफ़ा रात, तुझे तो अपना कर्ज़ चुकाना चाहिए
हर आरज़ू अब थमने की ज़िद पकड़ बैठी है
कागज़ की कश्तियों को जैसे कोई किनारा चाहिए
मत कर यूँ गुमान कि वहशत* से सामना हो
मेरी तरह , तुझे भी कोई तो सहारा चाहिए
अब हर सज़ा मंज़ूर है, तू इलज़ाम बरक़रार रख
आखिर ज़मानत को भी तेरा ही ज़माना चाहिए
क्यूँ समझदारी की सीड़ियों पर चढ़ना सीख गया हूँ
इक बार फिर मासूम बचपन सा कोई फ़साना चाहिए
अब न रुकेगा वक़्त और न होगी अधूरी सी ये रातें
मेरी नज़रों को इक नए आफ़ताब* का कोई नज़ारा चाहिए
कहाँ है मुश्किल यूँ हसरतों को गीतों में बयाँ करना
अपने शरीफ ज़हन के बीच इक दिल ही तो आवारा चाहिए
1. वहशत : loneliness
2. आफ़ताब : sun
Tuesday, December 21, 2010
Thursday, November 25, 2010
आज जवाबों की गुज़ारिश है तुझसे मौला
मेरी दुनिया मुझसे ही बांटकर तुझे क्या है मिला !!
क्या प्यार की बौछार नहीं थी दोनों तरफ
फिर उम्रदराज़ दरार डालकर तुझे क्या है मिला !!
इश्क़ करना जैसे तेरी इबादत था मेरे लिए
खुद से इस तरह हारकर तुझे क्या है मिला !!
बुन रहा था खुशियों से अपना अधूरा जहां
मुफ्त के ये ग़म सजाकर तुझे क्या है मिला !!
किसी ग़ैर को दोष देना , है मेरा ईमान नहीं
मेरे पीर , यह साज़िश रचाकर तुझे क्या है मिला !!
हर वक़्त हाज़िर था तेरी महफ़िल को सजाने
उस नादान को अपना साज़ बनाकर तुझे क्या है मिला !!
हँसते हँसते अलविदा कर गयी वो मुझे
मेरी रूह को बेवजह रुलाकर तुझे क्या है मिला !!
सामना है अब तो जैसे जहन्नुम के अँगारों से
जन्नत की बहारों से बेवक़्त निकालकर तुझे क्या है मिला !!
मेरी दुनिया मुझसे ही बांटकर तुझे क्या है मिला !!
क्या प्यार की बौछार नहीं थी दोनों तरफ
फिर उम्रदराज़ दरार डालकर तुझे क्या है मिला !!
इश्क़ करना जैसे तेरी इबादत था मेरे लिए
खुद से इस तरह हारकर तुझे क्या है मिला !!
बुन रहा था खुशियों से अपना अधूरा जहां
मुफ्त के ये ग़म सजाकर तुझे क्या है मिला !!
किसी ग़ैर को दोष देना , है मेरा ईमान नहीं
मेरे पीर , यह साज़िश रचाकर तुझे क्या है मिला !!
हर वक़्त हाज़िर था तेरी महफ़िल को सजाने
उस नादान को अपना साज़ बनाकर तुझे क्या है मिला !!
हँसते हँसते अलविदा कर गयी वो मुझे
मेरी रूह को बेवजह रुलाकर तुझे क्या है मिला !!
सामना है अब तो जैसे जहन्नुम के अँगारों से
जन्नत की बहारों से बेवक़्त निकालकर तुझे क्या है मिला !!
Saturday, November 6, 2010
चारों ओर जगमगाहट है , रोशनी भी है सब ओर फैली
फिर किस किरण का इंतज़ार करती मेरे दिल की सूनी दिवाली
कहीं जश्न है ज़ोरों पर कहीं महफ़िलें भी हैं सजी
इन खुशियों की कोई वजह ढूँढती मेरे दिल की सूनी दिवाली
यहाँ मेरे चारों ओर उजालें हैं चमके , रंगोलियाँ हैं बिखरी
इन वादियों से रंग उधार माँगती मेरे दिल की सूनी दिवाली
दो पल का वक़्त नहीं यहाँ लोग इस क़दर मसरूफ* हैं
वहाँ आराम के बीच कुछ काम ढूँढती मेरे दिल की सूनी दिवाली
जहाँ कई बैगानों की मुबारक फ़ीकी सी लगने लगती है
वहाँ चंद अपनों को याद करती मेरे दिल की सूनी दिवाली
किसी अपने ने जब गुज़ारिश की इस जश्न में डूब जाने की
इक दिया भर जलाने निकल पड़ी मेरे दिल की सूनी दिवाली
अपनों से जब बिछड़ जाऊंगा कुछ अरमानों को पाने
तब शायद इक हौसला सा दे जाए मेरे दिल की सूनी दिवाली
1. मसरूफ : Busy In
फिर किस किरण का इंतज़ार करती मेरे दिल की सूनी दिवाली
कहीं जश्न है ज़ोरों पर कहीं महफ़िलें भी हैं सजी
इन खुशियों की कोई वजह ढूँढती मेरे दिल की सूनी दिवाली
यहाँ मेरे चारों ओर उजालें हैं चमके , रंगोलियाँ हैं बिखरी
इन वादियों से रंग उधार माँगती मेरे दिल की सूनी दिवाली
दो पल का वक़्त नहीं यहाँ लोग इस क़दर मसरूफ* हैं
वहाँ आराम के बीच कुछ काम ढूँढती मेरे दिल की सूनी दिवाली
जहाँ कई बैगानों की मुबारक फ़ीकी सी लगने लगती है
वहाँ चंद अपनों को याद करती मेरे दिल की सूनी दिवाली
किसी अपने ने जब गुज़ारिश की इस जश्न में डूब जाने की
इक दिया भर जलाने निकल पड़ी मेरे दिल की सूनी दिवाली
अपनों से जब बिछड़ जाऊंगा कुछ अरमानों को पाने
तब शायद इक हौसला सा दे जाए मेरे दिल की सूनी दिवाली
1. मसरूफ : Busy In
Wednesday, October 27, 2010
इक अधूरे सपने सी है ज़िन्दगी की बेरंग तस्वीर मेरी
तू रंगों गुलालों से मुलाक़ात करा दे तो क्या बात है !!
छाया रहता है वक़्त का पहरा अब चारों ओर मेरे
चंद पल तू इनमें हसीन बना दे तो क्या बात है !!
जाने कहाँ ले जाए मुझे यह आग बरहम* की
तू इक दफ़ा प्यार की बौछार गिरा दे तो क्या बात है !!
सौ लोगों का मजमा* अब क्या दे पायेगा मुझे
चार हमदर्दों की तू महफ़िल सजादे तो क्या बात है !!
बातों से दिल जीतना अब जैसे आम बात है
कोई गीत तू बेमिसाल सुना दे तो क्या बात है !!
ग़मों का बोझ लेकर अब आगे बढ़ने की हिम्मत कहाँ
तू राह में खुशियों की चादर बिछा दे तो क्या बात है !!
ज़रूरतों का लेन-देन तो जैसे उम्र भर साथ रहेगा
चंद ख्वाहिशें तू मुझ पर उधार चढ़ा दे तो क्या बात है !!
अपनों के अपनाने का है वाज़ेह* गुमान* मुझे
किसी अजनबी से ग़र तू साज़ मिला दे तो क्या बात है !!
ज़िन्दगी की भूल-भुलैया में अब थक सा गया हूँ
तू मंजिल की इक तस्वीर दिखा दे तो क्या बात है !!
1. बरहम : Angriness
2. मजमा : Crowd
3. वाज़ेह : Obvious
4. गुमान : Proud
तू रंगों गुलालों से मुलाक़ात करा दे तो क्या बात है !!
छाया रहता है वक़्त का पहरा अब चारों ओर मेरे
चंद पल तू इनमें हसीन बना दे तो क्या बात है !!
जाने कहाँ ले जाए मुझे यह आग बरहम* की
तू इक दफ़ा प्यार की बौछार गिरा दे तो क्या बात है !!
सौ लोगों का मजमा* अब क्या दे पायेगा मुझे
चार हमदर्दों की तू महफ़िल सजादे तो क्या बात है !!
बातों से दिल जीतना अब जैसे आम बात है
कोई गीत तू बेमिसाल सुना दे तो क्या बात है !!
ग़मों का बोझ लेकर अब आगे बढ़ने की हिम्मत कहाँ
तू राह में खुशियों की चादर बिछा दे तो क्या बात है !!
ज़रूरतों का लेन-देन तो जैसे उम्र भर साथ रहेगा
चंद ख्वाहिशें तू मुझ पर उधार चढ़ा दे तो क्या बात है !!
अपनों के अपनाने का है वाज़ेह* गुमान* मुझे
किसी अजनबी से ग़र तू साज़ मिला दे तो क्या बात है !!
ज़िन्दगी की भूल-भुलैया में अब थक सा गया हूँ
तू मंजिल की इक तस्वीर दिखा दे तो क्या बात है !!
1. बरहम : Angriness
2. मजमा : Crowd
3. वाज़ेह : Obvious
4. गुमान : Proud
Saturday, October 16, 2010
न मेरा कुछ था , न कुछ जैसे अब मिल पायेगा
गर कुछ हैसियत है, तो है इन यारों की दोस्ती !!
कहाँ भाई संभालेगा और क्या समझा पाएगी वो बहन
अब मुझे अपनाने वाली हमदर्दी है , इन यारों की दोस्ती !!
शायद अब तक खुदा मुझसे सिर्फ छीन ही रहा था
पहली बार इक अनमोल तोहफे में मिली , इन यारों की दोस्ती !!
इतने अरसे से जो दिल में "मैं" की तन्हाई थी
अब वहीं "हम" का जज़्बा है , इन यारों की दोस्ती !!
कितनी शराफतों की हिदायत दे दुनिया वाले मगर
इक अटूट पागलपन का ख़ुमार है , इन यारों की दोस्ती !!
तुम चाहे करो हज़ारों खर्च अपनी आशिक़ी के लिए
मेरे लिए वो " दस रूपए उधार " है , इन यारों की दोस्ती !!
किताबों के चंद पन्नो से ज़िन्दगी बनाना तो सीख लिया
पर ज़िन्दगी "जीने" का असली मक़ाम है , इन यारों की दोस्ती !!
अब से कुछ फरमाइश नहीं रहेगी तुझसे मेरे खुदा
बस मेरे जहाँ में हरदम महफूज़ रहे , इन यारों की दोस्ती !!
गर कुछ हैसियत है, तो है इन यारों की दोस्ती !!
कहाँ भाई संभालेगा और क्या समझा पाएगी वो बहन
अब मुझे अपनाने वाली हमदर्दी है , इन यारों की दोस्ती !!
शायद अब तक खुदा मुझसे सिर्फ छीन ही रहा था
पहली बार इक अनमोल तोहफे में मिली , इन यारों की दोस्ती !!
इतने अरसे से जो दिल में "मैं" की तन्हाई थी
अब वहीं "हम" का जज़्बा है , इन यारों की दोस्ती !!
कितनी शराफतों की हिदायत दे दुनिया वाले मगर
इक अटूट पागलपन का ख़ुमार है , इन यारों की दोस्ती !!
तुम चाहे करो हज़ारों खर्च अपनी आशिक़ी के लिए
मेरे लिए वो " दस रूपए उधार " है , इन यारों की दोस्ती !!
किताबों के चंद पन्नो से ज़िन्दगी बनाना तो सीख लिया
पर ज़िन्दगी "जीने" का असली मक़ाम है , इन यारों की दोस्ती !!
अब से कुछ फरमाइश नहीं रहेगी तुझसे मेरे खुदा
बस मेरे जहाँ में हरदम महफूज़ रहे , इन यारों की दोस्ती !!
Friday, September 17, 2010
ख़ामोश से बैठे थे हम यूं अकेले !
बैठे - बैठे उनकी याद कहाँ से आ गयी !!
वक़्त की आँधियों से गुज़र रहे थे बेज़ुबां !
खुदा के रहम की यह धूप कहाँ से आ गयी !!
पा रहे थे अरसे से खुद को अँधेरे की सुरंगों में !
ना जाने उम्मीद की इक़ किरण कहाँ से आ गयी !!
जी रहे थे मौत को , तुझे भूलकर ऐ नादान !
तेरी याद के साथ ज़िन्दगी की सौग़ात कहाँ से आ गयी !!
खोज रहे थे इस जहान्नुम में जीने की राह !
ढूँढ़ते-ढूँढ़ते बीच राह में जन्नत कहाँ से आ गयी !!
निग़ाहों में ही बातें हुआ करती थी जिनसे किसी वक़्त !
ख्वाबों में पाकर आँखों में नमी कहाँ से आ गयी !!
रात के सुनहेरे पलों में जिसने हमें सोने न दिया !
इन बंजर उजालों के ख़यालों में कहाँ से आ गयी !!
बेझिझक बेपरवाह इशारें किया करती थी यूं भीड़ में !
तन्हा पाकर आँखें झुकाने की नज़ाकत* कहाँ से आ गयी !!
दूरियों का नाता था जिन रूहों के दरमियाँ !
अचानक से लबों के मिलन की बात कहाँ से आ गई !!
बेसुध होकर गुमशुदा से बैठे थे अपनी हसरतों को लिये !
बहते हुए उनकी चाहत हमारी रगों में कहाँ से आ गयी !!
दवाओं का असर भी रूठ चुका था जिस जिस्म से !
दुआ की पुड़िया में लिपटी वो फ़रियाद कहाँ से आ गयी !!
उनसे मिलने की ख्वाहिश तो इस दिल में क़ैद थी !
दहलीज़ पर वो ' प्यार की पहली चिट्ठी ' कहाँ से आ गयी !!
हम तो जनाज़ा उठाने की सजावट कर रहे थे !
उनकी चिट्ठी हमारी बारात लेकर कहाँ से आ गयी !!
दूर से जिनके दीदार पर हम आहें भरा करते थे !
आज हूबहू मुलाक़ात की बात कहाँ से आ गयी !!
पहुंचे इक़ बार ' फ़िर ' अरमानों की कश्ती में सवार !
और ' फ़िर ' पाया की वो अनदेखी दीवार कहाँ से आ गयी !!
चाहा था जिस माशूक से बहारों में मुलाक़ात होगी !
दो फूल लेकर वो कब्रिस्तान कहाँ से आ गयी !!
चाहकर भी उन्हें हाल-ऐ-दिल बयाँ न कर पाए !
पर उनकी ख़ामोशी की आवाज़ कहाँ से आ गयी !!
हर बार की तरह हम ख़ुशी में मसरूफ* थे !
देखा उनकी आँखों में आसूं की मार कहाँ से आ गयी !!
ले रहे थे इक़ नयी ज़िन्दगी की महक जैसे उनकी आगोश में !
पर उनके अश्क़ देख , खोए वजूद की याद कहाँ से आ गयी !!
माँगा था ऱब से जिस अजनबी को दुल्हन की तरह !
कब्र पर सफ़ेद लिबास की ये बेरुखी कहाँ से आ गयी !!
हो सकता था जिंदा , तेरी इक़ सिसक पर , ऐ दिलबर !
मुहब्बत की पुकार में उस खुदा की बंदिश कहाँ से आ गयी !!
ख़त्म हो चुका था नामोनिशाँ जब ज़माने से मेरा !
रूह को दफ़नाने की ये साज़िश कहाँ से आ गयी !!
ग़र नामंज़ूर थी मेरी दुनिया तुझे मेरे मौला !
तेरे चाहे बगैर ज़हन में ये बात कहाँ से आ गयी !!
ख़ामोश से बैठे थे हम यूं अकेले !
बैठे-बैठे उनकी याद ........................ !!
1. नज़ाकत : Elegance,softness
2. मसरूफ : Busy In
बैठे - बैठे उनकी याद कहाँ से आ गयी !!
वक़्त की आँधियों से गुज़र रहे थे बेज़ुबां !
खुदा के रहम की यह धूप कहाँ से आ गयी !!
पा रहे थे अरसे से खुद को अँधेरे की सुरंगों में !
ना जाने उम्मीद की इक़ किरण कहाँ से आ गयी !!
जी रहे थे मौत को , तुझे भूलकर ऐ नादान !
तेरी याद के साथ ज़िन्दगी की सौग़ात कहाँ से आ गयी !!
खोज रहे थे इस जहान्नुम में जीने की राह !
ढूँढ़ते-ढूँढ़ते बीच राह में जन्नत कहाँ से आ गयी !!
निग़ाहों में ही बातें हुआ करती थी जिनसे किसी वक़्त !
ख्वाबों में पाकर आँखों में नमी कहाँ से आ गयी !!
रात के सुनहेरे पलों में जिसने हमें सोने न दिया !
इन बंजर उजालों के ख़यालों में कहाँ से आ गयी !!
बेझिझक बेपरवाह इशारें किया करती थी यूं भीड़ में !
तन्हा पाकर आँखें झुकाने की नज़ाकत* कहाँ से आ गयी !!
दूरियों का नाता था जिन रूहों के दरमियाँ !
अचानक से लबों के मिलन की बात कहाँ से आ गई !!
बेसुध होकर गुमशुदा से बैठे थे अपनी हसरतों को लिये !
बहते हुए उनकी चाहत हमारी रगों में कहाँ से आ गयी !!
दवाओं का असर भी रूठ चुका था जिस जिस्म से !
दुआ की पुड़िया में लिपटी वो फ़रियाद कहाँ से आ गयी !!
उनसे मिलने की ख्वाहिश तो इस दिल में क़ैद थी !
दहलीज़ पर वो ' प्यार की पहली चिट्ठी ' कहाँ से आ गयी !!
हम तो जनाज़ा उठाने की सजावट कर रहे थे !
उनकी चिट्ठी हमारी बारात लेकर कहाँ से आ गयी !!
दूर से जिनके दीदार पर हम आहें भरा करते थे !
आज हूबहू मुलाक़ात की बात कहाँ से आ गयी !!
पहुंचे इक़ बार ' फ़िर ' अरमानों की कश्ती में सवार !
और ' फ़िर ' पाया की वो अनदेखी दीवार कहाँ से आ गयी !!
चाहा था जिस माशूक से बहारों में मुलाक़ात होगी !
दो फूल लेकर वो कब्रिस्तान कहाँ से आ गयी !!
चाहकर भी उन्हें हाल-ऐ-दिल बयाँ न कर पाए !
पर उनकी ख़ामोशी की आवाज़ कहाँ से आ गयी !!
हर बार की तरह हम ख़ुशी में मसरूफ* थे !
देखा उनकी आँखों में आसूं की मार कहाँ से आ गयी !!
ले रहे थे इक़ नयी ज़िन्दगी की महक जैसे उनकी आगोश में !
पर उनके अश्क़ देख , खोए वजूद की याद कहाँ से आ गयी !!
माँगा था ऱब से जिस अजनबी को दुल्हन की तरह !
कब्र पर सफ़ेद लिबास की ये बेरुखी कहाँ से आ गयी !!
हो सकता था जिंदा , तेरी इक़ सिसक पर , ऐ दिलबर !
मुहब्बत की पुकार में उस खुदा की बंदिश कहाँ से आ गयी !!
ख़त्म हो चुका था नामोनिशाँ जब ज़माने से मेरा !
रूह को दफ़नाने की ये साज़िश कहाँ से आ गयी !!
ग़र नामंज़ूर थी मेरी दुनिया तुझे मेरे मौला !
तेरे चाहे बगैर ज़हन में ये बात कहाँ से आ गयी !!
ख़ामोश से बैठे थे हम यूं अकेले !
बैठे-बैठे उनकी याद ........................ !!
1. नज़ाकत : Elegance,softness
2. मसरूफ : Busy In
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