Wednesday, April 3, 2013

बिछड़ा मैं खुद से अक्सर पर बिना रंज--ग़म निभाया तुझे
भीगी थी पलकें मेरी फिर भी सजा के उन पर बिठाया तुझे  !

सज़ा का हक़दार हूँ मैं जो थी दिखायी आंसुओं की रात कभी
रूठ जाना मेरी शख्सीयत से अब फिर कभी जो रुलाया तुझे !

मख्ज़न* में छिपाकर रख दिया कहीं अपना अनजान सच मैंने
जो झूठ लगा बिकने लायक उसे सच बना हरदम दिखाया तुझे !

ज़िन्दगी--तस्वीर पर अब उभरा करते तेरे दाग गहरे कहीं
ख्वाहिशों के हलके-गाढ़े रंगों से जो फिर बिगाड़ा फिर बनाया तुझे

चाहतें तेरी मेरी परिंदों सी, रहती इक जगह ये टिक कर
उड़ना सीखा तुझसे, फिर उड़कर संभलना सिखाया तुझे !   

अधूरी हसरतें बिखरे जज़्बात और चंद एहसास रख इक ओर मैंने
मसखरा बन अपने मासूम जहां में अक्सर यूं ही रिझाया तुझे

ज़िन्दगी के करतब बड़े अनोखे समझ पाया कोई इन्हें यहाँ
हर लम्हा याद भी किया तुझे और हर लम्हा ही भुलाया तुझे !

रस्मों-रिवाज़ों की धूल में जब तेरा जहां लगने लगता धुंधला कहीं
आँखें मूंद ख्यालों में ही बे-बाक़* अपनी दुनिया से मिलाया तुझे !

परायों ने जो छीना मुझसे जाने क्यूं थम गया हर ज़माना मेरा
भूल गया तेरी मदहोशी में मैंने भी था आखिर चुराया तुझे !


बे-बाक़ : fearlessly

मख्ज़न :store house