बिछड़ा मैं खुद से अक्सर पर बिना रंज-ओ-ग़म निभाया तुझे
भीगी थी पलकें मेरी फिर भी सजा के उन पर बिठाया तुझे !
सज़ा का हक़दार हूँ मैं जो थी दिखायी आंसुओं की रात कभी
रूठ जाना मेरी शख्सीयत से अब फिर कभी जो रुलाया तुझे !
मख्ज़न* में छिपाकर रख दिया कहीं अपना अनजान सच मैंने
जो झूठ लगा बिकने लायक उसे सच बना हरदम दिखाया तुझे !
ज़िन्दगी-ए-तस्वीर पर अब उभरा करते तेरे दाग गहरे कहीं
ख्वाहिशों के हलके-गाढ़े रंगों से जो फिर बिगाड़ा फिर बनाया तुझे !
चाहतें तेरी मेरी परिंदों सी, न रहती इक जगह ये टिक कर
उड़ना सीखा तुझसे, फिर उड़कर संभलना सिखाया तुझे !
अधूरी हसरतें बिखरे जज़्बात और चंद एहसास रख इक ओर मैंने
मसखरा बन अपने मासूम जहां में अक्सर यूं ही रिझाया तुझे !
ज़िन्दगी के करतब बड़े अनोखे न समझ पाया कोई इन्हें यहाँ
हर लम्हा याद भी किया तुझे और हर लम्हा ही भुलाया तुझे !
रस्मों-रिवाज़ों की धूल में जब तेरा जहां लगने लगता धुंधला कहीं
आँखें मूंद ख्यालों में ही बे-बाक़* अपनी दुनिया से मिलाया तुझे !
परायों ने जो छीना मुझसे जाने क्यूं थम
गया हर ज़माना मेरा
भूल गया तेरी मदहोशी में मैंने भी था आखिर चुराया तुझे !
बे-बाक़ : fearlessly
मख्ज़न :store house