Sunday, February 2, 2014

अक्सर ही यूं देखा है मैंने 
खुद से खुद को डरते हुए 
जी लेने के सब बहाने भूल 
कतरा कतरा होकर यूं मरते हुए 

इक दौर हुआ करती थी रातें मेरी अश्कों से भी कोमल                               #अश्कों : tears
लिये सहारा जब सपनो का जी जाता था मैं हर पल 
अब ज़िन्दगी की खुदगर्ज़ी में खुद से ही लड़ जाता हूँ 
फिर कोई सपना न बुन ले ये आँखें 
अब खुद से मैं डर जाता हूँ


कुछ लोग कभी थे साथ ज़िन्दगी की आँधी में जो बिछड़ गए
रहा दलदलों में मैं डूबता और वो पलक झपकते उभर गए
वक़्त की इस बेवफाई में अब उन्स-ओ-नातों से मैं मुकर जाता हूँ          #उन्स : Attachment
साँसों संग चल रहे इन मशरूत यारानों से                                          #मशरूत : Limited
अक्सर ही डर जाता हूँ !


खुशियों के बागानों में उम्मीदों के दरख़्त जो लगाये थे कभी
ग़रीब-ए-शहर में होकर भी सोने से आशियानें सजाये थे कभी
आज उन्ही बागानों को शहरों को मैं अनदेखा कर गुज़र जाता हूँ 
इस सौदेबाज़ी का अंजाम देख 
अपनी ही शख़्सियत से मैं डर जाता हूँ !


इस वक़्त से अब कहीं दूर चले जाने को जी करता है
उस पुराने जहां में वही लम्हे बिताने को जी करता है
मुमकिन ना-मुमकिन की खुदगर्ज़ जंग इक दफ़े भूलकर
फिर इक बार दिल खोलकर हस जाने को जी करता है


वो यारों की भीड़ में ग़ुम होती हस्तियाँ 
खुले आसमानों में तारे गिनने की नादानियाँ 
इक नन्ही शैतान की मासूम सी अठखेलियाँ 
कुछ अजनबी रिश्तों की महसूस होती नज़दीकियाँ 
वो उलझती नींदों में माँ की चैन भरी थपकियाँ
दादी के झूठे किरदारों की सच्ची लगती कहानियाँ 
अल्फाजों में बयां न कर पाए जो कभी 
किसी परवाह से जुड़ी पापा की वही मीठी ख़ामोशियाँ 

नज़रंदाज़ कर अब वक़्त की इस नज़ाकत को 
फिर सपने मुक़म्मल कर जाने को जी करता है                          # मुक़म्मल: Complete
यारानों में फिर कहीं डूब जाने को जी करता है 
आशियानें बना अब जी जाने को जी करता है
कई मुस्कुराहटें बिखेरने
फिर घर जाने को जी करता है
मेरा घर जाने को जी करता है
मेरा घर जाने को जी करता है.....