Tuesday, December 21, 2010

 क्यूँ किसी की याद रूह को बार-बार छू जाती है
बादलों को शायद बरसने का कोई बहाना चाहिए

बे-बुनियाद उम्मीदों में सिर्फ नींदे उधार चढ़ती है
ऐ बेवफ़ा रात, तुझे तो अपना कर्ज़ चुकाना चाहिए    

हर आरज़ू अब थमने की ज़िद पकड़ बैठी है
कागज़ की कश्तियों को जैसे कोई किनारा चाहिए

मत कर यूँ गुमान कि वहशत* से सामना हो
मेरी तरह , तुझे भी कोई तो सहारा चाहिए  

अब हर सज़ा मंज़ूर है, तू इलज़ाम बरक़रार रख
आखिर ज़मानत को भी तेरा ही ज़माना चाहिए

क्यूँ समझदारी की सीड़ियों पर चढ़ना सीख गया हूँ
इक बार फिर मासूम बचपन सा कोई फ़साना चाहिए

अब न रुकेगा वक़्त और न होगी अधूरी सी ये रातें
मेरी नज़रों को इक नए आफ़ताब* का कोई नज़ारा चाहिए

कहाँ  है मुश्किल यूँ हसरतों को गीतों  में  बयाँ करना
अपने शरीफ ज़हन के बीच इक दिल ही तो आवारा चाहिए

1. वहशत : loneliness 
2. आफ़ताब : sun