ख़ामोश से बैठे थे हम यूं अकेले !
बैठे - बैठे उनकी याद कहाँ से आ गयी !!
वक़्त की आँधियों से गुज़र रहे थे बेज़ुबां !
खुदा के रहम की यह धूप कहाँ से आ गयी !!
पा रहे थे अरसे से खुद को अँधेरे की सुरंगों में !
ना जाने उम्मीद की इक़ किरण कहाँ से आ गयी !!
जी रहे थे मौत को , तुझे भूलकर ऐ नादान !
तेरी याद के साथ ज़िन्दगी की सौग़ात कहाँ से आ गयी !!
खोज रहे थे इस जहान्नुम में जीने की राह !
ढूँढ़ते-ढूँढ़ते बीच राह में जन्नत कहाँ से आ गयी !!
निग़ाहों में ही बातें हुआ करती थी जिनसे किसी वक़्त !
ख्वाबों में पाकर आँखों में नमी कहाँ से आ गयी !!
रात के सुनहेरे पलों में जिसने हमें सोने न दिया !
इन बंजर उजालों के ख़यालों में कहाँ से आ गयी !!
बेझिझक बेपरवाह इशारें किया करती थी यूं भीड़ में !
तन्हा पाकर आँखें झुकाने की नज़ाकत* कहाँ से आ गयी !!
दूरियों का नाता था जिन रूहों के दरमियाँ !
अचानक से लबों के मिलन की बात कहाँ से आ गई !!
बेसुध होकर गुमशुदा से बैठे थे अपनी हसरतों को लिये !
बहते हुए उनकी चाहत हमारी रगों में कहाँ से आ गयी !!
दवाओं का असर भी रूठ चुका था जिस जिस्म से !
दुआ की पुड़िया में लिपटी वो फ़रियाद कहाँ से आ गयी !!
उनसे मिलने की ख्वाहिश तो इस दिल में क़ैद थी !
दहलीज़ पर वो ' प्यार की पहली चिट्ठी ' कहाँ से आ गयी !!
हम तो जनाज़ा उठाने की सजावट कर रहे थे !
उनकी चिट्ठी हमारी बारात लेकर कहाँ से आ गयी !!
दूर से जिनके दीदार पर हम आहें भरा करते थे !
आज हूबहू मुलाक़ात की बात कहाँ से आ गयी !!
पहुंचे इक़ बार ' फ़िर ' अरमानों की कश्ती में सवार !
और ' फ़िर ' पाया की वो अनदेखी दीवार कहाँ से आ गयी !!
चाहा था जिस माशूक से बहारों में मुलाक़ात होगी !
दो फूल लेकर वो कब्रिस्तान कहाँ से आ गयी !!
चाहकर भी उन्हें हाल-ऐ-दिल बयाँ न कर पाए !
पर उनकी ख़ामोशी की आवाज़ कहाँ से आ गयी !!
हर बार की तरह हम ख़ुशी में मसरूफ* थे !
देखा उनकी आँखों में आसूं की मार कहाँ से आ गयी !!
ले रहे थे इक़ नयी ज़िन्दगी की महक जैसे उनकी आगोश में !
पर उनके अश्क़ देख , खोए वजूद की याद कहाँ से आ गयी !!
माँगा था ऱब से जिस अजनबी को दुल्हन की तरह !
कब्र पर सफ़ेद लिबास की ये बेरुखी कहाँ से आ गयी !!
हो सकता था जिंदा , तेरी इक़ सिसक पर , ऐ दिलबर !
मुहब्बत की पुकार में उस खुदा की बंदिश कहाँ से आ गयी !!
ख़त्म हो चुका था नामोनिशाँ जब ज़माने से मेरा !
रूह को दफ़नाने की ये साज़िश कहाँ से आ गयी !!
ग़र नामंज़ूर थी मेरी दुनिया तुझे मेरे मौला !
तेरे चाहे बगैर ज़हन में ये बात कहाँ से आ गयी !!
ख़ामोश से बैठे थे हम यूं अकेले !
बैठे-बैठे उनकी याद ........................ !!
1. नज़ाकत : Elegance,softness
2. मसरूफ : Busy In
gr8 yar.....
ReplyDeleteafter reading dis....
ReplyDeletea person's will pop up in everyone's mind...:)
The best one you ever posted...
ReplyDeletethnx 2 all...:)
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