Friday, September 17, 2010

ख़ामोश से बैठे थे हम यूं अकेले !
बैठे - बैठे उनकी याद कहाँ से आ गयी !!

वक़्त की आँधियों से गुज़र रहे थे बेज़ुबां !
खुदा के रहम की यह धूप कहाँ से आ गयी !!

पा रहे थे अरसे से खुद को अँधेरे की सुरंगों में !
ना जाने  उम्मीद की इक़ किरण कहाँ से आ गयी !!

जी रहे थे मौत को , तुझे भूलकर ऐ नादान  !
तेरी याद के साथ ज़िन्दगी की सौग़ात कहाँ से आ गयी !!

खोज रहे थे इस जहान्नुम में जीने की राह !
ढूँढ़ते-ढूँढ़ते बीच राह में जन्नत कहाँ से आ गयी !!

निग़ाहों में ही बातें हुआ करती थी जिनसे किसी वक़्त !
ख्वाबों में पाकर आँखों में नमी कहाँ से आ गयी !!

रात के सुनहेरे पलों में जिसने हमें सोने न दिया !
इन बंजर उजालों के ख़यालों में कहाँ से आ गयी !!

बेझिझक बेपरवाह इशारें किया करती थी यूं भीड़ में !
तन्हा पाकर आँखें झुकाने की नज़ाकत* कहाँ से आ गयी !!

दूरियों का नाता था जिन रूहों के दरमियाँ !
अचानक से लबों के मिलन की बात कहाँ से आ गई !!

बेसुध होकर गुमशुदा से बैठे थे अपनी हसरतों को लिये !
बहते हुए उनकी चाहत हमारी रगों में कहाँ से आ गयी !!

दवाओं का असर भी रूठ चुका था जिस जिस्म से !
दुआ की पुड़िया में लिपटी वो फ़रियाद कहाँ से आ गयी !!

उनसे मिलने की ख्वाहिश तो इस दिल में क़ैद थी !
दहलीज़ पर वो ' प्यार की पहली चिट्ठी ' कहाँ से आ गयी !!

हम तो जनाज़ा उठाने की सजावट कर रहे थे !
उनकी चिट्ठी हमारी बारात लेकर कहाँ से आ गयी !!

दूर से जिनके दीदार पर हम आहें भरा करते थे !
आज हूबहू मुलाक़ात की बात कहाँ से आ गयी !!

पहुंचे इक़ बार ' फ़िर ' अरमानों की कश्ती में सवार !
और ' फ़िर '  पाया की वो अनदेखी दीवार कहाँ से आ गयी !!

चाहा था जिस माशूक से बहारों में मुलाक़ात होगी !
दो फूल लेकर वो कब्रिस्तान कहाँ से आ गयी !!

चाहकर भी उन्हें हाल-ऐ-दिल बयाँ न कर पाए !
पर उनकी ख़ामोशी की आवाज़ कहाँ से आ गयी !!

हर बार की तरह हम ख़ुशी में मसरूफ* थे !
देखा उनकी आँखों में आसूं की मार कहाँ से आ गयी !!

ले रहे थे इक़ नयी ज़िन्दगी की महक जैसे उनकी आगोश में  !
पर उनके अश्क़ देख , खोए वजूद  की याद कहाँ से आ गयी !!

माँगा था ऱब से जिस अजनबी को दुल्हन की तरह !
कब्र पर सफ़ेद लिबास की ये बेरुखी कहाँ से आ गयी !!

हो सकता था जिंदा , तेरी इक़ सिसक पर , ऐ दिलबर !
मुहब्बत की पुकार में उस खुदा की बंदिश कहाँ से आ गयी !!

ख़त्म हो चुका था नामोनिशाँ जब ज़माने से मेरा !
रूह को दफ़नाने की ये साज़िश कहाँ से आ गयी !!

ग़र नामंज़ूर थी मेरी दुनिया तुझे मेरे मौला !
तेरे चाहे बगैर ज़हन में ये बात कहाँ से आ गयी !!

ख़ामोश से बैठे थे हम यूं अकेले !
बैठे-बैठे उनकी याद ........................ !!

1. नज़ाकत : Elegance,softness
2. मसरूफ  : Busy In

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