Tuesday, July 15, 2014

घर की गुड़िया चली बनाने दुनिया अपने फर्ज़ों की
अपनो को बेग़ाना करती, क्यूं रीत बनी ये बरसों की !
इस घर का सूनापन अब तेरे चँचल मन को तरसेगा
तेरे एहसासों का बादल भी अब इक मौसम बन ही बरसेगा !!

धीमी धीमी होती थी जब तेरी बचपन की किलकारी
तुलसी सी महका करती थी मेरे घर की हर इक क्यारी !
तेरे नन्हे क़दमों की हरकत होती थी जब-जब इस आंगन में
सपने से सँवरते थे जैसे परी हो बैठी दामन में
रानी थी तू पापा की, आँखों में भी कहीं इक मस्ती थी
सोनल सी मुस्कान लिए तू बातों बातों में हसती थी !
जो चलती थी इतराकर तू, इक गुमां था अपने होने का
छलके हैं आँसूं आँखों से, अब ग़म है तुझको खोने का !!
  
ज़िन्दगी के इस मोड़ पे नयी राहों पर अब तुझे चलना होगा
बिगड़े ग़र हालात फिर भी तुझे हर कदम सम्भलना होगा !
खुशियां हो अब संग तेरे, माँग रहे ये हल्दी भरे हाथ
फ़िक्र का एहसास ना हो हमें, अब रस्म-ओ-रिवाज़ों के बाद,
पीछे छोड़ मा-बाबा का घर इक नया आशियाना तू सजाना
अनजाने से रिश्तों को भी बेटी बन तू बेपरवाह निभाना !!

जाने क्यूं छोड़ चली है तू इस आंगन की छांव को
किनारे क्यूं मिले हैं जाने अब तेरी कागज़ की नाव को,
हर मक़ाम अब पार हो तेरा, सब दुआएं होंगी तेरे साथ
खिलखिलाएंगे फिर चेहरे यहाँ जब भी होगी तेरी सौग़ात !

बयां ना हो अल्फ़ाज़ों से इतनी नाज़ुक सी ये घड़ी है
छीन रही है तुझको हमसे, दर पे जो बारात खड़ी है,
आया है चुराने तुझे शहज़ादा, होनी हसरतों की इक सगाई है
कई नाते हैं निखर रहे पर हमारे जज़्बातों की आज बिदाई है
हमारे जज़्बातों की आज बिदाई है…………

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