Tuesday, March 15, 2011


न हमसफ़र की कोई खबर न इस सफर का अंजाम पता
फिर भी तन्हा राहों में मैं क्यूँ कर रहा किसी का इंतज़ार !

कहने को चार अल्फ़ाज़ों से बना सस्ता सा मेल है यह
पर ज़िन्दगी के हर मेले में बिकता इक महंगा सा इंतज़ार !

कहीं न कहीं लफ़्ज़ों के नापतोल में कुछ कमी रही होगी
जो अपने हिस्से में फिर पाया कुछ पल का इंतज़ार !

मेरे सपनों के आँगन में कभी-कभी धीमी आहट सी तो हुई
मगर दस्तक देता हुआ फिर मिला कुछ देर का इंतज़ार !

यूं तो तकदीर के हर इम्तिहान में अव्वल हैं रहे
पर हर बार हमें मात देता रहा इम्तिहान-ए-इंतज़ार !

सोचा भूल जाऊं सब और दूं उसे फिर अजनबी का नाम
मगर कैसे ठुकरा दूँ इक तीखे तोहफे जैसा यह इंतज़ार !

फिर जानबूझ कर बातों-बातों में खुद से करार कर लिया
वो क्या समझे बेकरारी जिस अनजानी ने दिया यह "इंतज़ार" !!


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